आना होगा राम तुम्हें फिर से,
फिर से धर्म का ध्वज लहराना होगा।
अधर्म के अंधकार को मिटाकर,
न्याय का दीप जलाना होगा।
पैदा हो गए हैं अनेक रावण,
हर ओर अन्याय का विस्तार है।
कहीं आतंक, कहीं अत्याचार,
मानवता आज लाचार है।
फिर छल, कपट ने पाँव पसारे,
सत्य स्वयं संघर्ष कर रहा है।
इस पावन भारतभूमि के आँचल में,
अशांति का विषधर पल रहा है।
आना होगा राम तुम्हें फिर से,
मर्यादा का पाठ पढ़ाना होगा।
टूटते विश्वास, बिखरते सपनों को,
प्रेम के सूत्र में बाँधना होगा।
न धनुष की टंकार की चाह हमें,
न रक्त की धारा बहानी है।
बस सत्य, शांति और न्याय की राह पर,
नई चेतना जगानी है।
हर हृदय में राम बसें फिर से,
हर मन से बैर मिटाना होगा।
अधर्म, अहंकार और अन्याय हराकर,
मानवता का मान बढ़ाना होगा।
आना होगा राम तुम्हें फिर से,
फिर से विजय का उत्सव मनाना होगा।
सत्य की ज्योति जले जग में,
फिर रामराज्य का स्वप्न सजाना होगा।।
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