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ईद का चाँद, चंदा मामा

                
                                                         
                            रोज़े शुरू हुए, चाँद फिर याद आया
                                                                 
                            
मैं बस यहीं सोच रहा कि,
कितना समावेशी है ये चाँद का चेहरा
सबके लिए एक हैं , पर हर किसी के लिए अलग मतलब रखता है
हिंदू के लिए करवाचौथ की रात सजती है
कृष्ण जन्माष्टमी पर आँखें भर आती हैं
मुसलमान के लिए ईद की खुशी लाता है
ईद-उल-फितर का वो पहला चाँद मुबारक बन जाता है
बच्चों के लिए चंदामामा दूर के
दादा -दादी के किस्सों में समाता, बच्चों के सपनों में घूमता
बड़े होकर पता चला — वो मामा सबका है
बस मौके अलग, भाव अलग, नाम अलग
मैं भी कभी-कभी सोचता हूँ — चाँद-सा हो जाऊँ
मैं, मैं ही रहूँ चाँद सा , पर हर किसी के हिसाब से अलग
कोई पूजे, कोई देखे, कोई बस मुस्कुराए
मैं बस चुपचाप कभी चमकता रहूँ,कभी गुम हो जाऊ
पर इंसान हूँ ना...
छल -कपट, स्वार्थ, प्यार, घृणा, दया सब साथ चलते हैं
कभी तू-तू मैं-मैं, कभी लालच में सिर झुक जाता है
फिर भी चाँद को देखकर दिल कहता है —
"कोई नहीं...
हम वही रहें , जैसे है वैसे रहें
लोग आएँगे अपने हिसाब से जुड़ेंगे
अपने हिसाब से बिछड़ेंगे
हम बस चाँद-सा बने रहें शांत, सौम्य, समावेशी
सबके लिए हैं , फिर भी किसी के जैसे नहीं
बस अपने जैसा रहना..अपने जैसा कहना ।"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 महीने पहले

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