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हल्की होती नारी जाति ने दबाव कम नही पाया।

                
                                                         
                            जहाँ अस्तित्व अपनी परछाई से निकल आया।
                                                                 
                            
वक्त उससे आगे खुद जलील होता नजर आया।।

दिशाएँ भी वहीं और मंज़िल भी वहीं आज तक।
रुकने का अर्थ सही मायने में समझ नही पाया।।

कौन कहता शब्द समाप्त होते दुख तकलीफ़ में।
शुभचिंतक समझने वालों में लगाव नही पाया।।

कभी-कभी लगता है विचारो में जड़त्व का भाव।
जन्म पर उठे प्रश्नो के उत्तर भी समझ नही पाया।।

जिस क्षण मौन बोलने लगा शालीनता से 'उपदेश'।
हल्की होती नारी जाति ने दबाव कम नही पाया।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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एक घंटा पहले

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