अब हम भी घर से कम निकलते हैं।
धीरे-धीरे चाल-चलन को बदलते हैं।।
उम्रदराज की शिकायत वाजिब होगी।
मँहगाई में घर के चूल्हे कैसे जलते हैं।।
बरबादी का आलम शिक्षित जान पाया।
उनकी हुंकार से सत्ता के किले हिलते है।।
जिस तरह से बहलाए जा रहे थे 'उपदेश'।
उनके प्रभाव में आकर वही हाथ मलते है।।
नई पीढ़ी का ज़माना आने वाला समझ।
दीमक की तरह चट कर रहे उनसे डरते हैं।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X