आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मोहब्बत खेल समझते

                
                                                         
                            मोहब्बत नाम से वाकिफ नही हो तुम।
                                                                 
                            
खेल समझते इसके आदी नही हो तुम।।

तुमने शायद मेरी चाहत जानी ही नही।
गहरे आकर्षण से व्याकुल नही हो तुम।।

मोहब्बत समझोगे जब गिड़गिड़ाओगे।
अपने लिए माँगना भूले ही नही हो तुम।।

किसी के भले के लिए अपना नुकसान।
उसके लायक अभी 'उपदेश' नही हो तुम।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
44 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर