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वो अश्क़-अश्क़ उतर रहे

                
                                                         
                            वो अश्क़ अश्क़ बह रहे,
                                                                 
                            
मैं उदर से उतर रही!
वो आते जाते उधर से,
जिधर से मैं गुजर रही!
वो नब्ज़ नब्ज़ सम्भाल रहे,
मैं संभल संभल के चल रही,
वो मन-ए-मकां बना रहे,
मैं मनसूबे कुचल रही!
हया नही हवा में
जो ओर ओर चल रहे,
जरुरतों के मारे वो
दर-ब-दर टहल रहे,
वो निशा निशा निरख रहे,
मैं दिवा दिवा निखर रही!
वो शाम शाम ढल रहे,
मैं सुबह सुबह निकल रही!
वो अश्क़ अश्क़ बह रहे,
मैं उदर से उतर रही!!

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4 वर्ष पहले

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