जिंदगी जब समर की निशानी बनी
हर चुभन हौसलों की कहानी बनी।
चोट खाकर भी हँसना हुनर हो गया,
दर्द ही मंज़िलों का सफ़र हो गया।
हर शिकन माथे की ढाल बनने लगी,
साँस अंगार की ताल बनने लगी।
मुस्कुरा कर हर इक जखम सी लिया,
ज़िंदगी का समर जीत कर जी लिया।
राम का नाम केवल भजन तो नहीं,
धर्म की धार है, सिर्फ़ बचन तो नहीं।
राज-वैभव के सुख को सहज तज दिया,
कंटकों के पथों पर ही जीवन जिया।
त्याग की राह पर जब चला था अवध,
मर्यादा ने खींची थी हर एक हद।
उस तपस्या की लौ को हृदय में लिया,
ज़िंदगी का समर जीत कर जी लिया।
सत्य की राह पर पाँव डिगते नहीं,
हम वो पर्वत हैं जो कभी झुकते नहीं।
शीश झुकने दिया न कभी आन पर,
बाण साधा हमेशा ही तूफ़ान पर।
संकटों के समक्ष जब भृकुटि तन गई,
काल के भाल पर रार फिर ठन गई।
हर चुनौती का विष हँस के हमने पिया,
ज़िंदगी का समर जीत कर जी लिया।
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