दर्द भी मेरा, नशा भी मेरा,
ख़ामोशियों में बसा जहाँ भी मेरा।
लोग पूछते हैं, इतने गुमसुम क्यों हो,
क्या कहूँ उनसे, हर ग़म अब मेरा।
दो घूँट में दुनिया धुँधली-सी होती है,
कुछ पल को रूह भी हल्की-सी होती है।
ये कैसा सुकूँ है, ये कैसी तिश्नगी,
हर जाम के पीछे खड़ी है ज़िंदगी।
साँसें सुकूँ दे रही हैं या दर्द,
ये जीना सिखा रहा है या मौत का सबक़?
पीना मुझे जीना सिखा रहा है या मरना,
या ख़ुद से ही है मुझे हर रोज़ गुज़रना।
वक़्त है कि ख़ामोशी से गुज़रता जा रहा है,
हर शख़्स अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता जा रहा है।
आज आँख खुली है, कल बंद हो जाएगी,
आज मेरी आवाज़ है, कल ख़ामोशी रह जाएगी।
आज मैं सुनता हूँ, आज मैं देखता हूँ,
कल कौन जाने, किसकी यादों में रहता हूँ।
क्या हक़ीक़त है, क्या ख़्वाब है,
ये ज़िंदगी भी कैसा लाजवाब अज़ाब है।
मैं जाग रहा हूँ या किसी ख़्वाब में हूँ,
दिन के उजाले में हूँ या शब के नक़ाब में हूँ।
कौन जाने, मैं कहाँ हूँ, मेरा वजूद कहाँ,
मैं ख़ुद में ही मौजूद हूँ या हूँ ही नहीं यहाँ।
बस एक सवाल दिल में ठहर जाता है,
हर गुज़रता लम्हा मुझसे कुछ कह जाता है—
ऐ ज़िंदगी, तू सुकूँ है या इम्तिहान,
मैं तेरा मुसाफ़िर हूँ, या बस एक मेहमान?
जो मिला, वो ख़्वाब था या हक़ीक़त,
और जो खो गया—क्या वही थी मेरी ज़िंदगी की दौलत?
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