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एक परिकल्पना भीड़ की

                
                                                         
                            नीरवता नहीं बस कोलाहल है हर वक्त।
                                                                 
                            
शोर ही शोर गुंजायमान है हर तरफ ।।
उग्र रफ्तार हैं भीड़ की,एक भेड़ चाल है भीड़ की।
भीड़ की कोई परिभाषा नहीं है, यहां सब भीड़ हैं कोई इंसान नहीं है।।
सब भाग रहे हैं बदहवास,किसी को किसी की परवाह नहीं है ।
हर वक्त भीड़ बेहिसाब, किसी को किसी का इंतजार नहीं है।
बस भाग रहे हैं लगातार, किसी को किसी की तलाश नहीं है।
सिर ही सिर नज़र आते हैं हर तरफ,अपनों की अब पहचान नहीं है ।
बस भाग रहे हैं लगातार किसी को किसी की तलाश नहीं है ।
बढ़ रहा है बोझ धरती पर,उसके दर्द का अहसास नहीं है।।

 
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2 घंटे पहले

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