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खूब पढूं, और खूब कमाउ मेरी क्या ऐसी चाह नहीं।

                
                                                         
                            खुशियों के महलों में जो बैठे है,
                                                                 
                            
कैसे समझे मेरे मन के दुखड़े।
मैं अनाथ हूँ ऐसे बेताब,
खुशियों के महलों को पाने में।

है इस चाह में मेरी भूल क्या?
गिर जाता हूँ इसको पाने में।
क्या मेरी कोई इच्छा नहीं?
कि गिर जाता हूँ इस तहखाने में।

ये सोच सको, तो मुझको बताओ,
क्या खुशियों के आशिक होते हैं केवल धन वाले?
क्या मैं अनाथ मेरी कोई पहचान नहीं?
खूब पढूं, और खूब कमाउ मेरी क्या ऐसी चाह नहीं।
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1 hour ago

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