'एक चिड़िया: जो बोलती है'
बीते दिनों में मिला था उस चिड़िया से,
जो बोलती है इंसानों की भांति।
मैंने सुनी थी विरह-कहानी उसकी,
जो गढ़ी है इंसानों ने और इंसानों से।
डाल दाना, बिलखना सुना जो उसका,
रुदन स्वर में वजह उसकी मैं पूछ पड़ा।
सुनता रह गया मैं मौन खड़ा,
जब उसने दुःख कहा मुझसे-
"काट रैनबसेरे दरखत मेरे,
किया कैद मुझे धर्म के पिंजरे में।
करती थी शिकार जिन कीट-पतंगों का,
छुड़ा, दिया स्थान तुमने दानों को।
कर खत्म जैव चक्र,
गुलामी मेरे हाथ थमा दी।
करना ही है तुम्हें धर्म अगर,
तो बस इतना सा तुम दो मुझको।
काटना छोड़ इन पेड़ों को,
मेरा कर्म पुनः मुझको दान करो।
-दिनेश कुमार
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