त्योहार हर किसी के लिए उत्सव नहीं होता,
हर घर में खुशियों का बसेरा नहीं होता।
कहीं रोशनी से जगमगाते हैं मकान,
तो कहीं दो वक्त की रोटी के लिए परेशान हैं इंसान।
झोपड़ी के उन बच्चों ने भी सपने सजाए होंगे,
नए कपड़ों, खिलौनों के ख्वाब देखे होंगे।
उन्हें भी पटाखे चलाने का मन करता होगा,
अपने घर को दीयों से सजाने का दिल करता होगा।
मगर महँगाई और मजबूरियों के बीच,
क्या हर सपना पूरा हो पाता है?
जब किसी घर में चूल्हा तक नहीं जलता,
तो फिर त्योहार सबके लिए खुशियाँ कैसे लाता है?
बड़े-बड़े मॉल में जाकर खरीदारी करते हैं,
कभी सड़क किनारे के छोटे दुकानदारों को भी देखिए।
हो सके तो उनसे भी कुछ खरीद लीजिए,
शायद आपकी छोटी-सी कोशिश से
किसी के घर में दिवाली हो जाए।
क्योंकि दिवाली सिर्फ अपने घर को रोशन करना नहीं,
किसी और के अँधेरे में उम्मीद का दीप जलाना भी है।
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