आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अधूरे सपनों की दिवाली

                
                                                         
                            
त्योहार हर किसी के लिए उत्सव नहीं होता,
हर घर में खुशियों का बसेरा नहीं होता।
कहीं रोशनी से जगमगाते हैं मकान,
तो कहीं दो वक्त की रोटी के लिए परेशान हैं इंसान।

झोपड़ी के उन बच्चों ने भी सपने सजाए होंगे,
नए कपड़ों, खिलौनों के ख्वाब देखे होंगे।
उन्हें भी पटाखे चलाने का मन करता होगा,
अपने घर को दीयों से सजाने का दिल करता होगा।

मगर महँगाई और मजबूरियों के बीच,
क्या हर सपना पूरा हो पाता है?
जब किसी घर में चूल्हा तक नहीं जलता,
तो फिर त्योहार सबके लिए खुशियाँ कैसे लाता है?

बड़े-बड़े मॉल में जाकर खरीदारी करते हैं,
कभी सड़क किनारे के छोटे दुकानदारों को भी देखिए।
हो सके तो उनसे भी कुछ खरीद लीजिए,
शायद आपकी छोटी-सी कोशिश से
किसी के घर में दिवाली हो जाए।

क्योंकि दिवाली सिर्फ अपने घर को रोशन करना नहीं,
किसी और के अँधेरे में उम्मीद का दीप जलाना भी है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
18 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर