रंजो गम के सिवा दुनिया में रखा क्या हे?
मेरी हर खुशी को दीमक ने खा रखा हे |
ज़िम्मेदारियों ने वक्त से पहले समझदार बना दिया,
नहीं तो दिल में बचपना आज भी ज़िंदा रखा हे |
अब तितली नहीं मधुमक्षी सा स्वभाव रखती हूँ,
में भी अपने चेहरे पर अब नक़ाब रखती हूँ |
दुनियादारी की जब से समझ रखने लगी हूँ
आत्म संघर्ष के बाद प्राप्त आत्मबोध का दीपक
और तेज़ जला रखी हूँ |
जैसे को तैसे का चलन चला रखी हूँ |
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X