मुखौटों के नगर में सच बताना छोड़ आए हैं,
हवा के रुख़ पे जलता इक फ़साना छोड़ आए हैं।
दिखावे की मुहब्बत का जहाँ बाज़ार लगता है,
हमीं हैं जो दिलों का आशियाना छोड़ आए हैं।
ज़रूरत थी जहाँ सबको महज़ मतलब के रिश्तों की,
वहाँ हम बे-ग़रज़ उल्फ़त जताना छोड़ आए हैं।
सफ़र में धूप जब बिखरी तो साए भी जुदा निकले,
दिलों से अब भरम का वो ख़ज़ाना छोड़ आए हैं।
सिखाया वक़्त की ठोकर ने ख़ुददारी का पैमाना,
किसी की बंदगी में सर झुकाना छोड़ आए हैं।
लगे हैं मोल यहाँ हर मोड़ पर ईमान-ओ-ग़ैरत के,
हमीं जो बिक न पाए वो ज़माना छोड़ आए हैं।
हथेली पर लिए फिरते हैं सब नफ़रत के अंगारे,
वफ़ा के नाम पर आँसू बहाना छोड़ आए हैं।
सँभाली जब से ख़ामोशी तो दुनिया मुतमइन ठहरी,
शिकायत के हुनर को आज़माना छोड़ आए हैं।
कहा जब सच ज़माने से सुख़न में 'बाबरा' तूने,
फ़रेबी महफ़िलों में दिल लगाना छोड़ आए हैं।
- सुशील कुमार 'बाबरा'
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