ज़हर-ए-ग़म पीता रहा बचपन, तन्हाइयों का साया था,
शराब की तीखी बो से, हर रात घर कँपकँपाया था।
मासूमियत रुख़सत हुई, ज़ुल्म-ओ-सितम के दौर में,
ज़बानों पर पहरे थे, वो चीखता था शोर में।
सच्चाई की पादाश में, जब कोड़े पड़े उस मासूम पर,
इल्ज़ाम सहे बे-वजह ही, खामोशी छाई रूह पर।
सन्नाटों की चादर ओढ़े, वो दर्द छुपाता चला गया,
इंसानियत से उठ गया दिल, वो ख़ुद में ही ढलता चला गया।
तभी बहार-ए-नौ बनी, शालिनी की वो इक झलक,
काजल, नथ और बालियाँ, ठिठक गई पल में पलक।
डायरी के बिखरे पन्नों में, जो राज़-ए-दिल मफ़ऊम था,
बिना लिखे वो पढ़ गई, जो नाम तक ना मालूम था।
इश्क़-ए-हक़ीक़ी मुकम्मल होता, पर तमाशा-ए-ज़माना आ गया,
मर्यादा और रस्मों का, इक भारी तूफ़ाँ आ गया।
उसके अपनों की ख़ातिर, अपना ही दिल तोड़ दिया,
हासिल होकर भी उस राह में, हाथ उसका छोड़ दिया।
ख़त जो लिखा था दर्द में, उसे आतिश के हवाले कर दिया,
राख़ उड़ाई हवाओं में, इश्क़ को अमर कर दिया।
हर मक़सूर-ए-मोहब्बत, वाबस्ता-ए-विसाल नहीं होती,
कुछ कहानियाँ अधूरी रहकर भी, कभी पामाल नहीं होती।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X