सड़क का ट्रैफिक
गाँव की पगडंडी
से हटकर
सड़क पर दौड़ रहा
द्रुत गति से ट्रैफिक।
ग्लोकल से ग्लोबल
के सारे गुर पकड़
अब वैश्विक हो
उसी चाल से चल
बढ़ रहा ट्रैफिक।
स्पर्धा की वर्धा में
अपनी ही दुविधा में
चलता जा रहा
ट्रैफिक!!!।
संवाद और संवेदना
से कोसों दूर
अपनी राह बढ़ता
जा रहा
यही हाँ यही
सड़क का ट्रैफिक।
लाल पीली हरी बत्तियों
का पड़ाव लिए,
सभी की सुरक्षा के
संकेतक मात्र सजा
रहा सड़क का ट्रैफिक।
शैलेंद्र की तीसरी
कसम के गाड़ीवान
को चौंका रहा
सड़क का ट्रैफिक।
चमचमाता दमदमाता
दनदनाता निर्बाध गति से,
चौबीसों घंटे आ जा रहा,
यही सड़क का ट्रैफिक।
गति पर गति
बड़ी और बड़ी
गाड़ियों की भीड़
बढ़ाता ध्वनि
प्रदूषण।
यूं भी रोज़ रोज़
सुरसा के मुँह
की भांति बढ़ता जा
रहा ,वायु प्रदूषण।
तिस पर भी
प्रगति का राजदूत
बना,
चलता जा रहा
आत्मकेंद्रित आज
के मानव सा
सड़क का ट्रैफिक।
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X