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घिसी हुई चप्पलें

                
                                                         
                            घिसी हुई चप्पलें,,
                                                                 
                            
आज की पीढ़ी
जी ऑ अल्फ़ा को
देखतीं
घिसी हुई चप्पलें।

आभासी ऑ कल्पना
में डूबी ,
मोबाइल पर सोती
जागती दुनिया को
देखतीं,
घिसी हुई चप्पलें।

मेहनत को धत्ता बताती
जंक फूड,बीयर
ऑ शराब को पीती
नाचती।
पीढ़ी को हैराँ हो ताकती
यही घिसी हुई चप्पलें।

कंप्यूटर और ए आई
में पढ़ लिख कर,
संवादहीन होती,
पीढ़ी को घूरती
यही ! यही घिसी
हुई चप्पलें।
बात बात पर
स्वच्छंदता से स्वेच्छाचारी
बनती पीढ़ियों के कोलाहल
को सुनती
ये पुरातन घिसी हुई चप्पलें।
न अतीत की समझ
न वर्तमान को सोच
न भविष्य का भास
बेबसी से निहारती
यही पुरखों की प्रतिमान,
घिसी हुई चप्पलें।
कभी कड़ी मेहनत
कड़े यम नियम योग
और आसन से सजती,
अनुशासन से सादगी
को साधती।
संस्कार संस्कृति को
संभालती,
परम्पराओं को सहेजती,
यही घिसी हुई चप्पलें।
ग्लोकल से ग्लोबल होते
इंडिया से भारत होने का
ख़्वाब देखतीं
यही हाँ! भई हाँ!?
पुरानी घिसी हुई चप्पलें।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
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16 घंटे पहले

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