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मेरे अल्फाज़

चुनाव की आड़ ---खेत खा गई बाड़ (व्यंग्यात्मक कविता)

Surjit Dogra

35 कविताएं

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फिर से बजा है चुनावी बिगुल,
मचने वाली है हलचल।
होगी गहमागहमी भी,
ढेर सारी गलतफहमी भी।
व्यवस्था भी है सहमी सी।
साफ दिख रही है एक आकृति,
होगी फिर पुनरावृति
मार धाड़ की, दुराचार की,
उद्दाम भ्रष्टाचार की।

चुनाव तो बस एक बहाना है
चलो ,खेत खाने वाले बाड़ को
एक बार फिर मिल कर बनाना है।

अरे भाईयों,जरा सुनो ; हां, तुम सारे,
अनपढ़, गुंडे , हत्यारे,
चोर उचक्के , बलात्कारी,
सफेद पौशाक धारी,
तुम भी बाबा चमत्कारी,
फिर आ गई तुम्हारी बारी।
अरे ,तुम भी रुको मवाली,
बड़े हो भाग्यशाली।
खड़े हो जाओ,
तुम से अच्छा नहीं कोई,
करता हूं मैं पेशगोई।
अवश्य जीतोगे तुम,
संसद तुम्हें जाना है,
लोकतंत्र के मंदिर को
कुश्ती का अखाड़ा बनाना है।

चुनाव तो बस एक बहाना है
चलो ,खेत खाने वाले बाड़ को
एक बार फिर मिल कर बनाना है।

ए जी,ओ जी,सुनो जी,2जी
का याद है न वह घोटाला,
और वह खेलों का गड़बड़झाला।
कोयले की दलाली में
जो हुआ था मुंह काला।
हमारी गाय का चारा,
किसी ने खा लिया सारा।
एक भी डकार नहीं मारा।
वह बोफोर्स की तोप ,
अगस्ता की खेप।
सुनहरी मौका आया है,
हर हाल में इसे भुनाना है।
हर हथकंडा अपनाना है।
भरा पड़ा देश का खज़ाना है,
मिल बांट कर खाना है।
अभी तो राफेल भी उड़ाना है।

चुनाव तो बस एक बहाना है
चलो ,खेत खाने वाले बाड़ को
एक बार फिर मिल कर बनाना है।

फिर से रंगीन हो जाएंगे मयखाने,
खुल जाएंगे काले धन के तहखाने।
गरीबों की फिर याद आएगी,
दलितों की खीर भी खूब मन को भाएगी।
नोटों की बरसात होगी,
पुराने अधूरे वादों की लाश पर
बिछी नए वादों की बिसात होगी।
एक बार फिर मतदाता को बेवकूफ बनाना है।

चुनाव तो बस एक बहाना है
चलो ,खेत खाने वाले बाड़ को
एक बार फिर मिल कर बनाना है।


सुनो मेरे देश के मतदाताओ,
तुम इन की बातों में मत आओ।
सेंकने दो इन्हें अपनी राजनीतिक रोटियां,
मत खेलना तुम इस बार कच्ची गोटियां।

सुरजीत “बिल्लू”

अस्वीकरण : सभी इमानदार , वस्तुनिष्ठ भाव से लोकहित में कार्य करने वाले नेता /प्रत्याशी इस कविता के परिवेश से बाहर हैं।यह रचना हमारे सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में घटित हो रहे क्रियाकलापों पर सांकेतिक व्यंग्य है।


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