कुछ मक्खियों ने प्रयास किया
क्षितिज को छूने का,
मेघों पर दूब बोने का।
जुगनू, पतिंगे और मच्छरों ने योजना बनाई,
तय हुआ कि अभियान का नेतृत्व करेगा भूरा भँवरा।
पहला घेरा टिड्डों का,
उनके पीछे होंगी पंखों वाली चींटियाँ।
घुड़मक्खियों को भी मिला था न्योता
अभियान में जुड़ने का,
पर वज़न बढ़ गया था उनका
और न था मन उड़ने का।
झींगुर ने पूछा—
“ऐसा क्या अपनों का डर है?”
मधुमक्खी ने फुसफुसाया—
“सुना है, डाकू मक्खियों को भी
सारी ख़बर है।”
तितलियों को भी
अंबुद पर सिर रखकर सोना था,
अविरल स्वायत्तता को पाना था।
फल मक्खियों ने
प्रयोजन की विषमताओं पर सोचकर
उपहास किया।
मकड़ियों के बीच
इस मुहिम की सार्थकता पर बहस हुई—
“जब मक्खियों का जीवन सीमित है,
तब क्षितिज की कल्पना व्यर्थ नहीं?”
वस्तुतः,
अंत में सब व्यर्थ ही तो है।
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