सौम्य शांत सरल स्वभाव,
हरियाली छाई रहती है ।
श्वेत हिम मेघों से मिलकर ,
शीश सजाए रखती है ।
भारत मां का भव्य किरीट,
जो गगन का चुंबन करता है ।
ऊंचे ऊंचे पहाड़ यहां ,
कश्मीर इसे जग कहता है।
इसी स्वर्ग की पावन भू पर ,
वो शौक मनाने आए थे ।
कुछ मस्ती में कुछ छुट्टी पर,
कुछ प्रीत निभाने आए थे।
नई नई शादी का कोई ,
लुत्फ उठाने आया था ।
भाग दौड़ वाले जीवन में ,
कोई समय बिताने आया था।
सुकून भरे इस संगम को ,
मातम में बदलने आए थे ।
वे मुस्काते सुमनों को ,
बेधड़क नोचने आए थे।
वो धर्म पूछने आए थे ,
संग में बंदूकें लाए थे ।
कश्यप जी की धवल धरा को,
लहू से रंगने आए थे।
बर्बरता से बारी बारी,
मासूमों का रक्त बहाया।
निर्दोषों की चीत्कारों से,
बेसरन घाटी गुंजाया।
नई नवेली दुल्हन ने ,
ये मंजर भी देखा था ।
अपनी आंखों के आगे ,
शौहर को मरते देखा था।
भारत की अर्बुद आंखों ने ,
वो दृश्य भी देखा था।
जब उसकी बेबस बेटी ने,
सिंदूर भाल से पोंछा था।
रजनी की रोई थी आँखें,
कहां गगन भी सोया था ।
मां भारती के आंगन का
उस दिन बच्चा बच्चा रोया था।
अमन अहिंसा के शब्दों का ,
अब कोई उन्माद न था ।
बात सुता सिंदूर की थी ,
सवाल राष्ट्र पुरुषार्थ का था ।
भूल गए तुम वीर शिवाजी ,
महाराणा के भालों को।
गौरा बादल की शमशीरें,
जयमल कल्ला के बाणों को ।
याद नहीं क्या तुर्रम खान ,
क्या लक्ष्मी है भूल गए।
तात्या टोपे , मंगल पांडे,
आजाद भगत को भूल गए।
आओ सब की याद दिलाएं ,
अब सेना का शौर्य दिखाएं ।
बेटी के सिंदूर की ताकत ,
आओ अब हम तुम्हे दिखाएं।
आकाश, पृथ्वी ,नाग , त्रिशूल,
अग्नि की लपटें दिखलाएं।
राफेल तेजस की रफ्तारों से,
आओ अब परिचय करवाएं।
भू पर बिखरा धिया सिंदूर ,
अब पाक लहू से पोंछेंगे।
लाहौर कराची को तो छोड़ो ,
पेशावर ना छोड़ेंगे ।
सुन ले कपटी पाकिस्तान ,
सोफिया व्यमिका का ऐलान।
हम मानवता के सच्चे रक्षक ,
भारतीयता है पहचान ।
तुम तो कच्चे प्यादे निकले ,
एक पहर भी टिके नहीं।
आए जो हम धर्म बताने ,
सुनने को तुम डटे नहीं।
आकाओं की गोद से ,
फुदकने वाले सुन हैवान ।
यह अंतिम ताक़ीद है,
खोल कर सुन ले अपने कान ।
आगे कोई फरेब किया तो,
नए रंग में आयेंगे ।
सब मर्मों की छोड़ अकेले ,
सिर्फ धर्म निभाने आयेंगे ।
सन इकहत्तर क्या याद नहीं ,
हम एहसास कर देंगे ।
जैसे बांग्लादेश बनाया,
ब्लूचिस्तान बना देंगे ।
फिर भी ना सुधरे तो सुन लो ,
कब्रिस्तान बना देंगे ।
दुनिया के नक्शे से अबके ,
पाकिस्तान मिटा देंगे ।
धरती की छाती के ऊपर,
यह कलंक हटा देंगे ।
सरहद की मनहूस लकीरें,
अबकी बार मिटा देंगे ।
डेढ़ अरब आवामी सपना ,
सच कर के दिखला देंगे ।
धर्म पूछने वालो सुन लो
धर्म का मर्म समझा देंगे ।
अखंड भारत का कर निर्माण,
माटी का कर्ज चुका देंगे ।
अपना धर्म निभाएंगे ,
हम अपना धर्म निभाएंगे।
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