उनके बच्चे—
दूध की नदी में नहाते हैं,
विदेशी स्कूलों में सपने गढ़ते हैं,
मुलायम बिस्तरों पर सोते हुए
कल के राजा बनते हैं।
हमारे बच्चे—
नंगे पाँव धूल में चलते हैं,
भूख से पेट पर हाथ बाँध कर सोते हैं,
कभी कूड़े में रोटी ढूँढते हैं,
कभी किसी अमीर की गाड़ी के नीचे कुचल जाते हैं।
उनके बच्चे—
हर साल विदेश की हवा खाते हैं,
सैलूनों में इज्ज़त चमकाते हैं,
संसद के गलियारों में
अपनी ताजपोशी की तैयारी करते हैं।
हमारे बच्चे—
भूख में सड़कों पर दम तोड़ते हैं,
भीख मांगने के ताने सुनते हैं,
और हर पाँच साल में
अपने बाप के साथ कतार में खड़े होकर
वोट डाल आते हैं।
ताकि उनके बच्चे
और ऊँची इमारतें बनवा सकें,
ताकि उनके महलों की रौशनी
हमारी झोपड़ियों की रात चुरा सके।
कभी सोचा—
क्यों हमारे बच्चे
अधूरी किताबें और अधूरी रोटियाँ लेकर
किस्मत की कब्र में सो जाते हैं?
क्यों हम हर बार
उन्हीं हाथों में अपनी तक़दीर रख आते हैं,
जिन्होंने हमें लूटा,
हमारे सपनों को बेचा,
हमारी आँखों को भीख में बदल दिया?
कभी तय करो—
अब और नहीं।
अब हमारा वोट
तिजोरी का ताला नहीं होगा,
अब हमारा वोट
भूख का व्यापार नहीं होगा।
कभी तय करो—
कि ये मिट्टी
सिर्फ उनके बच्चों की जागीर नहीं,
हमारे बच्चों की भी धरती है,
हमारे सपनों की भी कसम है।
कभी अपने बच्चे की आँख में देखना,
अगर उसमें आँसू हों,
तो समझ लेना—
तुम्हारे वोट से किसी और की रौशनी हुई,
तुम्हारे ही घर का चूल्हा बुझा।
अब वक्त आ गया है—
जागने का,
सवाल करने का,
हिसाब माँगने का।
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