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मैं भी इंसान हूँ

                
                                                         
                            भाई,
                                                                 
                            
मैं नीची जाति का हूँ—
इसलिए क्या
तुम्हारी दोस्ती के योग्य नहीं?

मेरी जाति पूछने से पहले
कभी मेरी आँखों में देखना,
वहाँ भी वही सपने हैं
जो तुम्हारी आँखों में पलते हैं।

तुम्हारे घर की चौखट
मुझे रोक सकती है,
पर मेरी मनुष्यता को
कहाँ रोक पाओगे?

तुमने मुझे नाम से पहले
एक जाति बना दिया,
और फिर उसी जाति के भीतर
मेरी पूरी पहचान खोज ली।

कितना अजीब है—
तुम चाँद तक पहुँचने की
तकनीक पर गर्व करते हो,
लेकिन अपने ही पड़ोसी के
मन तक पहुँचने में
जाति की दीवार खड़ी कर देते हो।

तुम कहते हो—
“तुम मेरे दोस्त बनने के योग्य नहीं।”

मैं पूछता हूँ—
दोस्ती के लिए जाति चाहिए
या एक धड़कता हुआ दिल?

मैं तुमसे
तुम्हारी ऊँचाई नहीं माँगता,
बस इतनी जगह माँगता हूँ
जहाँ मुझे
तुमसे छोटा न समझा जाए।

क्योंकि सुनो—
जन्म मैंने नहीं चुना,
जाति मैंने नहीं बनाई,
पर मनुष्य होकर जीना
मेरा अधिकार है।

और यदि
किसी मनुष्य को
मनुष्य मानने के लिए भी
तुम्हें उसकी जाति देखनी पड़े—
तो समस्या मेरी जाति में नहीं,
तुम्हारी दृष्टि में है।

एक दिन
तुम्हारी सारी ऊँचाइयाँ
तुमसे यही सवाल पूछेंगी—

जिसे तुमने दोस्ती के योग्य नहीं समझा,
वह तुमसे कम इंसान था
या तुम उससे कम मनुष्य निकले?
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4 घंटे पहले

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