आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दीयों की रौशनी

                
                                                         
                            वे बचाते हैं भाषा को
                                                                 
                            
कि कोई शब्द डरे नहीं
किसी बोली में
भय की राख न चिपके
वे बचाते हैं सपनों को
कि हर सपना जागकर
एक नया देश गढ़ सके
वे सुनते हैं फुसफुसाहटें खेतों की
पेड़ों की ओट में
सुनते हैं घास की सिसकियाँ
और नदी के पानी में
मिट्टी का अंश पहचानते हैं
उनके प्रश्न
सिर्फ सत्ता की दीवारें नहीं हिलाते
बल्कि देश की जड़ों को
मजबूत भी करते हैं
वे खड़े हैं
सच का दीया हाथों में थामे
जब राजनीतिक आंधियाँ
लपटों से घरों को झुलसा रही हैं
वे उजाले की उतनी बाती बढ़ाते हैं
जितनी अंधेरे की चुनौती है
वे जानते हैं
कि चमकता सच
आसान नहीं
मगर चुप रहना
आत्मा को चेतना शून्य बना देता है
वे खिंचतें हैं
अपनी हँसी में विरोध की लकीर
अपनी आँसुओं में
भर देते हैं आशा की धूप
नारे, झंडे और जुमलों से परे
उनकी संवेदना की नसों में
लोकतंत्र की दौड़ है
उनकी आवाज़ में
उनके सपनों में
न्याय और समता की फसलें हैं
वे चौराहे पर खड़े
सच की मशाल थामे
सबकुछ सहेंगे
पर फैलने नहीं देंगे कभी
झूठ का उजाला

आंधी तेज़ है
सत्ता के डर की
मगर दीया
उनकी नरम मुलायम हथेली पर
अडिग है
इन्हीं दीयों की रौशनी में
देश पहचान पाता है
अपना सच्चा चेहरा
इन्हीं ‘देशद्रोहियों ‘ के कंधों पर
बचा रह जाता है
देश की आत्मा का आख़िरी दीप।
..
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर