धूप सी तुम चमकती रहीं
अंधेरा सा मै छिपता रहा
गगन के चांद सी निखरतीं रहीं
जुगनू सा मैं टिमटिमाता रहा.
लहर सी नदी की मचलती रहीं
मैं शांत जल सा तड़पता रहा
फूल तुम पर चढे तुम पुजतीं रहीं
मै सिजदा भी तेरा कर न सका.
खुशबू सी तुम महकतीं रहीं
मैं मुठ्ठी में बंद कर न सका
तुम खिलखिलाती रहीं सामने
मैं एकाकी मौन देखता रहा.
रुप की माधुरी चंचल सी तुम
मैं बस एकटक निहारता रहा
तुम बुला न सकीं मैं आ न सका
बस संकोच से पांव जकडे रहा.
तुम आईं बहारें लिए साथ में
मैं बहारों को भी छू न सका
जलाये दीप आँखों में चमकती रहीं
मै ताव तुम्हारी ला न सका.
-सुधा गोयल
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