वो मालिक कहलाते हैं, खुद को भगवान समझते हैं,
हम शिक्षकों को नौकर नहीं, बंधुआ मजदूर समझते हैं।
मुँह पर अपशब्दों की बौछार करते हैं,
राष्ट्र निर्माता का हर पल अपमान करते हैं।
पीरियड तो नाम का है, पूरा स्कूल हमसे चलवाते हैं,
बाबू, क्लर्क, चौकीदार, सबका काम हमीं से करवाते हैं।
सुबह सबसे पहले आओ, सबसे बाद में जाओ का फरमान है,
ओवरलोडेड काम देकर, देर तक रोकने में ही उनकी शान है।
छुट्टी माँग लो तो एहसान जताते हैं,
तनख्वाह के नाम पर बस हज़ार पकड़ाते हैं।
कहते हैं - नहीं करना तो छोड़ दो, लाइन लगी है बाहर,
तुम्हारी जरूरत ही नहीं क्या ही कर रहे हो यहाँ रहकर।
फिर भी हम पढ़ाते हैं, क्योंकि बच्चों से प्यार है,
मैनेजर की गालियों में भी, हमें अपना कर्तव्य याद है।
कहीं ऐसा न हो एक दिन ये तानाशाही भी टूट जाए,
किसी प्राइवेट शिक्षक के दिल की आह से ये भ्रम ही टूट जाए।
पाप के इनके कही घड़ा न भरपूर हो जाए ,
उसकी बद्दुआ से कही ये मालिकाना न चकनाचूर हो जाए।
-सुधा पाण्डे
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