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पिता

                
                                                         
                            पिता
                                                                 
                            
नन्ही- नन्ही आँखों में
खुद को बड़ा होते देखता है
जीता नहीं खुद की साँसो में
उस नन्हे-से जीवन में
जीवन वो अपना जीता है।

संतोष कहाँ उसको
हर क्षण
श्रम की आग में
वो खुद को झोंक देता है
नन्हे कदमों के खातिर
हर बढ़ता कदम
वो अपना रोक देता है।

हर रिश्ते से बड़ा रिश्ता
हर नाम से बड़ा नाम
आकाश से ऊँचा कद जिसका
धरती से बड़ा जहान।


जिसकी छत्रछाया में
हर गम से दूर रहते हैं
दर्द वह सारे सहते हैं
किसी से कुछ ना कहते हैं।

और कोई नहीं है, वो
उन्हें हम, पिता कहते हैं
उन्हें हम, पिता कहते हैं।

यह एक नाम ही
जीवन का
आधार स्तंभ और आवरण है
हमें सुख की नींद देकर भी
उसकी आंखों में जागरण है।

कंधों पर बिठा जिसने
दिखाए थे दुनिया के मेले
इस दर्द भरी भीड़ में
फिर भी रहते हैं, वो बिल्कुल अकेले।

ऐसे धीर पिता को
नमन बारंबार है
बना रहे आकाश हमारा
हे ईश्वर! बस यही गुहार है।

~ ममता रानी
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2 वर्ष पहले

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