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विपदा के मारे वन-प्राणी

                
                                                         
                            कभी धरा जंगल होती थी,
                                                                 
                            
जीव घनेरे होते थे।
भोज्य पदार्थ से भरी थी धरती,
कभी नहीं वे रोते थे।

नदी, पोखरे जगह-जगह थे,
बेफिक्र कहीं भी सोते थे।
कल की चिंता किए बिना ही,
कभी कहीं भी होते थे।

आज घेर लिए चहुँतरफा वन,
घर, सड़क, फैक्ट्री बना दिए।
विपदा के मारे वन-प्राणी,
खुद के प्राण भी गँवा दिए।

देखने को चिड़ियाघर के सिवा,
अब नजर कहीं न आते हैं।
कई नस्लें बिल्कुल न रहीं,
जिन्हें देख नहीं हम पाते हैं।

पेड़ों को हमने काट दिया,
धरती का आँचल छीन लिया।
अपने सुख की खातिर हमने,
जीवों का आशियाना छीन लिया।

नदियाँ सूखी, पोखर सूखे,
वन भी धीरे-धीरे घटते हैं।
जिन वृक्षों की छाया में कभी,
पशु-पक्षी पलते-बढ़ते हैं।

अब भी यदि हम चेत जाएँ,
धरती को फिर हरा बनाएँ।
पेड़ लगाएँ, वन बचाएँ,
जीवों को उनका घर लौटाएँ।

धरती केवल अपनी नहीं है,
इस पर सबका अधिकार है।
पशु-पक्षी और पेड़-पौधे,
सबसे इसका प्यार है।

यदि वन होंगे, जीवन होगा,
नदियों में फिर पानी होगा।
धरती माँ मुस्काएगी फिर,
हर आँगन में हरियाली होगी।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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