आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ऊँची सोच

                
                                                         
                            सोच अगर ऊँची हो,
                                                                 
                            
तो फर्क नहीं कुछ पड़ता,
इंसान गरीब हो चाहे,
शहज़ादा हो कहलाता।

धरती हो चाहे बिस्तर,
नीला गगन हो चादर,
ख्वाब अगर हों ऊँचे,
तो मन छू लेता अंबर।

दिन-रात पसीना बहता,
जो मेहनत करता जाता,
आँखों में अडिगता लेकर,
हर बाधा से टकराता।

सीखने की भूख हो मन में,
ज्ञान की प्यास न मिटती,
हर पल लक्ष्य की ओर बढ़े,
हिम्मत फिर कभी न झुकती।

नींद भले कम हो जाए,
पर सपने बड़े सजाता,
दिन, महीने, वर्ष गुज़रते,
वह लक्ष्य से न घबराता।

जब लगन अडिग हो मन में,
और कर्म निरंतर चलता,
तो देर भले हो जाए,
सफलता का दीपक जलता।

ऊँची सोच, कठिन परिश्रम,
अडिग रहे विश्वास,
जिसके मन में ये तीनों हों,
मंज़िल उसके पास।
-सूबा लाल "अंजना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर