सोच अगर ऊँची हो,
तो फर्क नहीं कुछ पड़ता,
इंसान गरीब हो चाहे,
शहज़ादा हो कहलाता।
धरती हो चाहे बिस्तर,
नीला गगन हो चादर,
ख्वाब अगर हों ऊँचे,
तो मन छू लेता अंबर।
दिन-रात पसीना बहता,
जो मेहनत करता जाता,
आँखों में अडिगता लेकर,
हर बाधा से टकराता।
सीखने की भूख हो मन में,
ज्ञान की प्यास न मिटती,
हर पल लक्ष्य की ओर बढ़े,
हिम्मत फिर कभी न झुकती।
नींद भले कम हो जाए,
पर सपने बड़े सजाता,
दिन, महीने, वर्ष गुज़रते,
वह लक्ष्य से न घबराता।
जब लगन अडिग हो मन में,
और कर्म निरंतर चलता,
तो देर भले हो जाए,
सफलता का दीपक जलता।
ऊँची सोच, कठिन परिश्रम,
अडिग रहे विश्वास,
जिसके मन में ये तीनों हों,
मंज़िल उसके पास।
-सूबा लाल "अंजना"
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