जिस धरती पर जन्म लिया,
वह धरती मेरी माता है।
जिसने जल, फल, अन्न दिया,
वह स्वयं ही मेरा विधाता है।
इस माटी से मेरा रिश्ता,
हर साँस मुझे समझाती है,
जिससे मेरा जीवन है,
उससे ही मेरी नाता है।
इस माटी का एक-एक कण,
मेरे जीवन से प्यारा है।
मैं इस धरती का सपूत हूँ,
मुझको इसका ही सहारा है।
इसके अन्न का ऋण है मुझ पर,
इसका जल भी मैंने है पीया ,
माँ की रक्षा करने के लिए ,
आज शपथ मैने है लिया।
मैं सैनिक हूँ, मैं प्रहरी हूँ,
माँ की रक्षा मुझे करना है।
सीमा पर चाहे प्राण जाएँ,
पीछे न कदम को धरना है।
माटी माँ की लाज बचाने,
सीना तान के लड़ना है,
जब तक साँस रहे तन में,
भारत के लिए ही मरना है।
नस-नस में जो रक्त बह रहा,
इस धरती का दान है,
मेरे तन का बल भी माँ का,
मेरा जीवन उसका मान है।
इस प्रकृति ने तन-मन संवारा,
इसने मुझको जीवन है दिया,
आज समय है ऋण चुकाने का,
माँ ने मुझको अवसर है दिया।
बर्फीली सीमा हो चाहे,
या तपता रेगिस्तान ही हो,
आँधी हो या तूफान उठे,
दुश्मन का कोई अभियान हो।
तिरंगा मेरी आन रहेगा,
भारत मेरी शान रहेगा,
माँ के आँचल पर आँच न आए,
जब तक मेरा प्राण रहेगा।
गोलियाँ अगर सीने पर हों,
फिर भी कदम न डगमगा सके,
मौत सामने खड़ी मिले तो,
हम हँसकर उसको अपना सकें।
एक-एक बूंद लहू की मेरी,
माटी के नाम चढ़ेगी,
मेरी अंतिम साँस भी माँ के,
चरणों में जाकर पड़ेगी।
न पूछो सैनिक क्या करता है,
सैनिक अपना धर्म निभाता है।
माँ की रक्षा में जो मर जाए,
वही अमर कहलाता है।
जिस मिट्टी ने जन्म दिया है,
उस पर जीवन वार दिया है,
भारत माँ की जय बोलकर,
मैंने अपना शीश दिया है।
माँ! तू चिंता मत करना,
तेरा लाल खड़ा सीमा पर है।
तेरी आन, तेरा सम्मान,
मेरे हाथों के जिम्मे है।
जब तक सूरज-चाँद रहेगा,
मेरा तिरंगा लहराएगा,
माटी का यह कर्ज चुकाने,
हर सैनिक जन्म-जन्म आएगा।
जय जवान! जय भारत!
वंदे मातरम्!
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X