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माँ बाप की साया

                
                                                         
                            पिता वृक्ष की छाया बनकर,
                                                                 
                            
जीवन सुखद बनाते हैं।
माँ माली बन सींच-सींचकर,
हर दुख दूर भगाते हैं।

पिता धूप में खुद जलकर भी,
शीतल छाँव दिलाते हैं।
माँ अपने आँचल की छाया,
हर पल प्यार लुटाते हैं।

पिता कठिन संकट में आकर,
मजबूत सहारा बनते हैं।
माँ ममता की गंगा बनकर,
मन के घाव सभी भरते हैं।

पिता सपनों को पंख लगाकर,
ऊँचा उड़ना सिखाते हैं।
माँ गिरने पर हाथ पकड़कर,
फिर से चलना सिखाते हैं।

दोनों मिलकर जीवन-पौधा,
हर मौसम में पालते हैं।
अपने सुख को त्याग-त्यागकर,
बच्चों का सुख ढालते हैं।

जब तक सिर पर हाथ रहे उनका,
मन में विश्वास जगाते हैं।
माँ-बाप का आशीष मिले तो,
कठिन रास्ते सरल बनाते हैं।

समय रहे तो सेवा कर लो,
बाद समय मत पछताना।
माँ-बाप से बढ़कर जग में,
नहीं कोई धन-खज़ाना।

उनके चरणों में जो झुकता,
सच्चा सुख वह पाता है।
माँ-बाप की सेवा करके,
जीवन सफल बनाता है।
-सूबा लाल "अंजना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
40 मिनट पहले

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