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अकेलेपन से वार्तालाप

                
                                                         
                            अकेला कमरे में बैठा, खुद से सवाल कर रहा था,
                                                                 
                            
मन के विचारों से पल-पल लड़ रहा था।
हवा से कहता कुछ, फिर खामोशी सुनता था,
दीवारों से अपना दर्द कहता था।

बाहर शोर न था, फिर भी मन अशांत था।
कभी बीते कल को सोचता,
कभी आने वाले कल को,
कभी पूछता—आखिर खोज रहा हूँ किसको?

शाम ढली, अँधेरा भर गया,
पर मन का अँधेरा गहरा हो गया।
दीवारें सवाल पहचानती थीं,
पर मन ने दरवाज़ा नहीं खोला।

थककर सूनेपन से विदा ली,
मगर तन्हाई ने साथ नहीं छोड़ा।

सोचा, हर उत्तर आज मिलना ज़रूरी नहीं,
कुछ प्रश्नों का साथ भी जीवन से कम नहीं।
कमरे में मेरा दर्द, सपना और अनकहा था।

कल फिर लौटूँगा शायद,
शायद मन अपने सवाल समझे।

अकेलापन अजीब साथी है—
भीड़ में याद आता है,
और पास बैठकर
इंसान को खुद से मिलाता है।
— सूबा लाल "अंजाना"
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एक घंटा पहले

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