प्रेम-मैत्री के प्रतिमान -
अपेक्षा,
निश्छलता,
हास्य विनोद,
भावनाओं का सम्मान।
होने लगे जब इनका भान -
उपेक्षा,
छल,
व्यंग,
भावनाओं का अपमान;
हो सावधान,
समझ लो अवसान,
उस प्रीति का
जिस पर था गुमान।
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