कोख में मां ने नौ महीने,
रक्त से सींचकर जन्म दिया,
पाल पोसकर लाड प्यार से,
नाज़ों से पिता ने बड़ा किया!
प्यार की भंडार उस बिटिया को,
हर बार बेटा ही कह बुलाया,
बेटी होने का एहसास तो बस,
उस दुल्हन के जोड़े ने दिलाया!
जब पूछा गया उस बिटिया के
रिश्ता तय हो जाने पर
कितना खर्चा कर पाएंगे
आप बारातियों के आने पर!
हमारा तो एक ही है बेटा,
हम तो धूम मचाएंगे,
कोई कमी न रहने पाए देख लेना,
नहीं तो लोग बातें बनाएंगे!
सोना इतना देना कि,
पड़ोसनें जल जाएं,
रिश्तेदारों के कपड़े,
विदेशी ब्रांड के ही आएं!
मन में तो सोचा बेटी तो
हमारी भी लाखों में एक है,
इसकी खुशी के लिए ही तो,
सपने बुने अनेक हैं!
चलो घर गिरवी रख,
कुछ सोना ले आएं,
बिटिया के पीहर से
कहीं कोई चूक न हो जाए!
कैसे रीति रिवाज हैं ये,
क्यों बेटे की बोली लगाते हो,
जीवन भर की पूंजी को,
कपड़े गहने में तुलवाते हो!
वो बिटिया घर छोड़कर अपना,
घर दूजे के जाती है,
उन माता पिता की आंखों में
ढेरों आंसू दे आती है!
बचपन का वो आंगन,
वो लाड भरा संसार,
छोड़ आती है जीवन भर के लिए,
लाने दूजे घर में बहार!
पढ़ी लिखी, पैरों पे खड़ी,
भरी हुई संस्कारों से,
जीवन भर की इस सौगात की
तुलना कैसे करोगे उपहारों से!
क्या पढ़े लिखों की दुनिया में भी इस
कुप्रथा का प्रचलन नाइंसाफी नहीं?
क्या किसी घर की रौनक को अपने घर में,
जीवन भर के लिए पाना काफी नहीं?
क्या सच में इतना काफी नहीं?
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X