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शिकवा-ए-इश्क

                
                                                         
                            सुना है सबसे ऊपर है खुदा का मिम्बर
                                                                 
                            
है मेरे सीने तेरे दर खुदा से ऊपर

मैंने देखा फरिश्ते तुझे सजदा करते
तेरे आते ही एक हजार खुदा झुक पडते
इश्क वाले तेरे नाम का कलमा पढ़ते
लेके तस्बी हम तेरे नूर से दुआ करते

तेरे चेहरे का नूर नूर ए खुदा पर गालिब
तेरा हर बोल जैसा आयत ए कुरान नाज़िल
सिर्फ तू ही सही और जहां में सब बातिल
जिस्म जिंदा है मेरा रूह की तू ही कातिल

तेरे इश्क-ए-वतन के गुलिस्तां हैं हम
ला-दीन नहीं थोड़े से गुस्ताख़ हैं हम
तुझे देख के बे-जुर्म गिरफ़्तार हैं हम
तू मेरा खुदा तेरे दीनदार हैं हम

कोई बता दे मुझे तेरी ज़ुबान क्या है कोई
मर्ज़ गहरा मेरा इसकी दवा क्या है कोई
अपने रब से मोहब्बत की सज़ा क्या है कोई
इश्क़ साकिन है मेरा इसकी दुआ क्या है कोई

तेरे बेरुख की शिकायत भला किस से कहें
तेरे साए में जीने की तमन्ना भला किस से कहें
तू ख्वाब-ए-अहलिया तू ही हाज़िर नाज़िर
जब तू ही खुदा दर्द-ए-बयां किस से कहे

है हमें भी इकबाल सा शिकवा तुझसे
गिला रब से नहीं हमको गिला है तुझसे

लब्ज़ थोड़े हैं मगर बात तो खंति है अभी
सर सलामत फतवा-ए-शिर्क बाकी है अभी
तेरे बवस्ता जो फिरदौस से मरहूम हैं हम
हो अहलिया तू रजामंद तेरी बाकी है अभी...

 
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एक वर्ष पहले

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