कोई न जाने पल भर में क्या से क्या हो जाए,
राजा रंक बने पल में और रंक राजा हो जाए।
जब ख़ुद ही मार रहे कुल्हाड़ी हम अपने पैरों पर,
तो दोष दें क्यों कुदरत को जब विपदा आ जाए।
'और-और' की हवस यहाँ कभी ख़त्म नहीं होती,
अपनी चाहत की ख़ातिर सारे पेड़ कटते जाएँ।
छाँव नहीं होगी तो फिर पिघलेंगे ही ग्लेशियर,
मिलकर बढ़ाएँ हरियाली शायद धरा बच जाए।
जब तक मिटेगी नहीं यह व्यक्तिवादी विचारधारा,
संतुलित नहीं होगी धरती चाहे जितना आगे बढ़ जाएँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X