बेशक मनाएं हम स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास से,
मगर यह ख़्याल रहे, मिली है आज़ादी हमें त्रास से।
तिरंगे का शौर्य फिर कुटिल ताकतों को न भाए,
छुटा जो दमन, वो दौर-ए-सितम लौट न आए।
दुर्गम थीं राहें फिर भी सरहदों को सबने पार किया,
अंग्रेज़, अफ़गानी, तुर्कों ने हमको लाचार किया।
आज जब राहें सुगम हुईं, मंसूबे उनके हुए आसान हैं,
हर दिल में रहे सजगता, वक़्त का यही पैगाम है।
नमन है उन जांबाज़ों को, जिन्होंने दी शहादत है,
व्यर्थ न जाए लहू उनका, यही अपनी इबादत है।
आपसी वैमनस्य और मतभेदों को अगर हम पालेंगे,
हरि सिंह जैसी भूल से, फिर पीओके जैसा कुछ गँवाएंगे।
उत्सव ज़रूर मनाएं, पर सतर्कता का कड़ा पहरा हो,
फिर कोई बेड़ी न जकड़े, एकता का संकल्प गहरा हो।
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