माथे पर जो आँख सजे, वो कोई साधारण बात नहीं,
जिसमें पूरा सत्य समाया, ऐसी कोई रात नहीं।
जब-जब जग ने सीमा लाँघी, शिव ने मौन तोड़ा है,
तीसरी आँख खुली तो उसने, हर अंधियारा छोड़ा है।
उस आँख में अग्नि भी है, उस आँख में ज्ञान भी,
भस्म करे अहंकार सभी, दे जीवन को मान भी।
काम जला, अभिमान जला, जले अधर्म के सारे रंग,
शिव की दृष्टि पड़े जहाँ पर, मिट जाए हर झूठा ढंग।
न क्रोध है वह केवल, न केवल प्रलय की ज्वाला,
वो तो भीतर का सत्य दिखाती, हर मन का उजियाला।
जो खुद से आँख चुराता है, उससे सच कहलवाती है,
जो अंधकार में भटक रहा हो, राह उसे दिखलाती है।
तीसरी आँख हमें सिखाती—पहले खुद को जानो,
मन के भीतर छिपे विकारों को पहचानो, मानो।
बाहर के रावण जीतने से पहले मन को जीत लिया करो,
शिव की तरह विष पीकर भी जग में अमृत बाँट दिया करो।
जब अन्याय की सीमा टूटे, शिव का रौद्र जगाता है,
जब प्रेम पुकारे भोले को, वही शिव गले लगाता है।
एक ही माथे पर अग्नि भी, एक ही हृदय में प्यार,
ऐसे हैं मेरे महादेव, जग के पालनहार।
हे नीलकंठ! बस इतनी-सी कृपा अपनी कर देना,
मेरी तीसरी आँख को भी थोड़ा-सा जाग्रत कर देना।
दुनिया को देखने से पहले, अपना मन दिख जाए,
तेरी दृष्टि से देखूँ जग को, हर कण में तू मिल जाए।
हर हर महादेव की ध्वनि से, मन का तम हर जाए,
शिव की तीसरी आँख खुले तो, भीतर शिव उतर आए।
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