मेरे हिस्से में...
मुझे हैरानी होती है
जब लोग कहते हैं—
“अब तो औरतें बराबर हो चुकी हैं…”
बराबरी?
किस बात की बराबरी?
आज भी जब किसी की ज़िन्दगी
किसी और की इजाज़त पर टिकी हो।
तुम्हारी खामोशी
गंभीरता,
और मेरी खामोशी
सहमति मान ली जाती है।
सवाल ये है कि—
तेरे हिस्से में जवाब ही क्यों
मेरे हिस्से में सवाल ही क्यों?
तेरे हिस्से में पूरी मर्जी तेरी
मेरे हिस्से में
सिर्फ इज़ाज़त ही क्यों?
तुम्हारी थकान
आराम माँगती है,
मेरी थकान से
और काम ही क्यों?
तुम्हें नहीं लगता—
ये जायज नहीं?
तेरे हिस्से में सिर्फ तू
मेरे हिस्से में
पूरी मैं भी नहीं?
सवाल अब भी वही है—
कि औरतों को
आगे क्यों नहीं बढ़ने दिया गया?
क्योंकि शायद समाज को डर था
कि कहीं वो आगे बढ़कर
पीछे मुड़कर पूछ न ले—
“अब तक मुझे पीछे क्यों रखा?”
मुझे तुम्हारी गुलामी की जरूरत ही क्यों?
तुम्हारे ये कह देने पर
गर्व ही क्यों—
"मैंने उसे पूरी आजादी दी है।"
क्योंकि आज़ादी
दी नहीं जाती।
आज़ादी होती है।
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