सुनो,
तुम्हें याद हैं
वो झील को छूती
हरे पेड़ों की शाखें,
मजनूओं के झुरमुट,
मैं बाँसुरी बजाया करता था,
और तुम मेरे उत्संग में,
बँसुरी सुनते-सुनते सो पड़ती थी।
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शाम जब चाँदनी
झील में अवतरित होती थी,
बिजली के खंभों की रोशनी
झील में सितारों-सी तैरने लगती थी
हम तुम अनिच्छा में उठते
वितरित होते, चल पड़ते थे,
अपने-अपने कॉलेज हॉस्टल की तरफ़
अपने-अपने वार्डन से डरकर,
छुप-छुपाकर
अपने-अपने रूम में सिमटने के लिए।
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सुुनो,
तुम्हें याद है
रातों में जागकर तुम्हारा
छोटी-छोटी क्षणिकाएं लिखना
अगली दोपहर कहीं न कहीं
किसी न किसी किताब के भीतर छुपाए
मुझे, अपनी वो नन्हीं कविताएं पढ़ाना
और मेरा चलती क्लास में
प्रोफेसर के लेक्चर के बीच,
पाँच दस पन्नों पर
तक़रीबन रोज़ ही नई,
अविरल प्रेम कविता कहना
तुम्हारे नख-शिख वर्णन करना
तुम्हारे नयनों, पलकों, भोहों,
रक्तिम गालों, हाेंठों,
धवल मुस्कुराते दाँतों
और उभरे उरोजों को छूते-छुपातेे,
काले घने लंबे गेसुओं पर,
नये-नये शब्द खोजकर
नित-नवल प्रेम-काव्य कहना
साप्ताहिक पाक्षिक मासिक पत्रिकाओं में
प्रकाशित कर मन-विभोर होना।
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सुना,
आज तुम्हारे बच्चे शादी की उम्र में आ गए,
और इधर मैंने बच्चों की शादी कर ली,
जल्दी शादी, जल्दी बच्चे,
एवं बच्चों की भी जल्दी शादी,
सबकुछ जल्दी-जल्दी कम उम्र में,
इस तरह जीवन अपना
जल्दी-जल्दी दरकिनार-सा हो गया।
किंतु न तन बूढ़ा हुआ,
न मन ही बदला है अभी
आज भी तुम्हें,
अविवाहित, कमसिन देखता हूँ
आज भी स्वयं को,
उसी कुर्ता पैजामा हवाई चप्पल में,
जेब में कागज कलम लिए
यूनिवर्सिटी की सीढ़ियों में पाता हूँ,
घड़ी-घड़ी काव्य लिखता हूँ
नीरस पेशे के बीच-बीच में कोमल कविताएं,
चाय कॉफी नाश्ते की टेबल पर क्षणिकाएं,
कानून मेरी जीविका है,
जीवन आज भी कविता है।
-
मुझे नहीं लगता मेरी कविता की आत्मा
तुमसे दूर हो पाएगी अंत तक,
उधर तुम भी लिखती हो मुझ पर निरंतर,
आदि से अनंत तक।
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