आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

१५ अगस्त विशेष- ऐसे में क्या लिखूँ जी, इस स्वतंत्रता दिवस पर भी

                
                                                         
                            नाले के कीड़े मकोड़े
                                                                 
                            
संसद भवन तक चढ़ गए
देशद्रोहियों की बाहरी फंडिंग से
मुल्क़ में कुछ लोफर उछल लिए
गोया बरसाती मेंढक मजे में फुदक लिए
पूरी उम्र लगभग विदेश में बिताने वाला
भोला 56 बरस का आरामपसंद राजकुमार
जाने कब कहाँ से क्या,
अनाप-शनाप-अंड-बंड सीख लाए
आकर संसद में लोफरबाजी कराए,
देश की पूँजी लुटवाए,
ऐसे में क्या लिखूँ जी,
इस स्वतंत्रता दिवस पर भी!

संसद, बीयर-बार बनाकर रख दी,
793 नटों के तमाशे का अखाड़ा
रोज़ाना दस करोड़ पूँजी,
फूँक जाते मान्यवर
जन सेवक कहलाते मान्यवर
दिन भर हुड़दंग मचाते मान्यवर
सरकारी क़िफ़ायती खाना छक जाते मान्यवर
शाम में
दारू मुर्गा काजू बादाम रमते मान्यवर
कैमरे पर हाय-हाय के नारे लगाते मान्यवर,
रातभर देख अपना ओछापन टीवी पर,
ख़ूब प्रसन्न, बिस्तर पर इतराते मान्यवर,
ऐसे में क्या लिखूँ जी,
इस स्वतंत्रता दिवस पर भी!

व्यवस्था का मूल
शठे शाठ्यं समाचरेत् की विदुर नीति है,
'टिट फॉर टैट' जॉन हेवुड की सफल नीति है
आचारः प्रथमो धर्मः,
शीलं परं भूषणम्
यथा राजा तथा प्रजा,
हमारी युगांतर मर्यादा है,
न जनता में रहे मापदंड, न शासकों में
संसद में भेजे 793 बंदे शासक ही तो हैं
शासक भिखारी हैं इस जनतंत्र में,
विज्ञजन या मूर्खजन का अंगूँठा सम है
उसके लिए भ्रष्ट या राष्ट्रभक्त एक सम है
ऊँच नीच सबका आशीवर्चन माँगे जनतंत्र,
"मूर्ख जनैः बहुमतं, तत्र पंडितः उपेक्ष्यते",
"यत्र वहवः तत्र न बुद्धिः" चाणक्य कह गए,
और हम आज़ादी की अति कर लिए हैं,
हम जनतंत्र के सारे मानक तोड़ लिए हैं
ऐसे में क्या लिखूँ जी,
इस स्वतंत्रता दिवस पर भी!

आजादी के नाम पर संस्कारों की बलि दे दी,
समलैंगिकों व्यभिचारियों लिव-इन के
संरक्षण में खड़ी अदालतें,
जंतर-मंतर के स्थान पर,
छात्रों का मुखौटे पहनकर,
अश्लील नंगी हरकतों, गाली-गलौचों
जीबी रोड के दुश्चरित्र ग्राहकों
अपराधियों आतंकियों के कुकर्म नज़रअंदाज़ कर,
जनतंत्र के वास्ते दयालु बनी अदालतें,
अति हो गई, हद हो गई इस जनतंत्र की
‘शठे शाठ्यं समाचरेत्’ की मूल धारणा ही मार दी,
वोट-भय के कारण हुड़दंगियों को क्षमादान दे दी,
अब आगे देखिएगा जहरीली करामातें सपोलों की;
ऐसे में क्या लिखूँ जी,
इस स्वतंत्रता दिवस पर भी!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर