वो ख्वाहिशों से भरा बचपना
खट्टी-मीठी बातों का वो सपना।
कुछ सपने हुए पूरे
कुछ सपने रह गए अधूरे।
जब आसमां को दूर देखते
तब छोर उसका ढूंढने की सोचते ।
वो नीले सफेद बादलों के पुंज
जो दिखते गुदगुदे मुलायम कुंज
सूरज का वो लाल गोला
ललचा जाता मन को हौला ।
रात में जब चांद को देखा
चरखा काटते बुढ़िया को पाया।
वो टिमटिमाते से है तारे
जो जुगनू से लगते हैं सारे।
खिलते हुए फूल से जब मिले
आशाओं के दीप मन में जले।
वो लंबी डगर देखते हैं कभी
ये जाएगी कहां सोचते हैं सभी।
छोटी-मोटी वो बातें होती
मन को वो उत्साह से भरती।
न मोबाइल न टीवी होता
आपसी सहयोग का नेटवर्क रहता।
चंद पैसे की जो आवक होती
पर बचपन में वो सुकून भरती।
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