कल तक जहाँ
घरों की खिड़कियों से
हँसी बाहर आती थी,
आज वहीं
मलबे के बीच
किसी खिलौने की चुप्पी है।
नेपाल की धरती ने
जब करवट बदली,
तो केवल इमारतें नहीं गिरीं—
गिर गया इंसान का वह भ्रम भी
कि सब कुछ हमेशा
उसके हाथ में है।
पर्वत आज भी खड़े हैं,
नदियाँ अब भी बह रही हैं,
आसमान भी वही है—
बस कुछ आँगनों में
अब लौटकर नहीं आएँगे
वे कदम,
जिनकी आहट से
घर हुआ करते थे घर।
कितना नश्वर है जीवन—
सुबह की चाय के साथ
जिस भविष्य की योजनाएँ बनती हैं,
कभी-कभी
एक पल की करवट में
वह भविष्य
मलबे के नीचे दब जाता है।
फिर भी देखो—
तबाही के बीच
कोई हाथ
किसी हाथ को थामता है,
कोई अनजान
किसी अनजान के आँसू पोंछता है,
कोई माँ
अपने बच्चे को सीने से लगाकर कहती है—
“डर मत, मैं हूँ।”
शायद यही
तबाही के बाद की ज़िंदगी है—
टूटे घरों से अधिक
टूटे दिलों को सँभालना,
ईंटों से पहले
उम्मीद को उठाना,
और राख के बीच
मानवता की
एक छोटी-सी लौ बचा लेना।
आज नेपाल हमें पुकार रहा है—
देखो,
मिट्टी पर इतना अभिमान मत करो,
ऊँची दीवारों पर इतना गर्व मत करो,
कल क्या होगा,
यह किसी को मालूम नहीं।
जो साँस अभी तुम्हारे भीतर है,
वह किसी और की
आखिरी साँस भी हो सकती है।
इसलिए लौटो—
अपने भीतर के इंसान की ओर।
किसी रोते हुए
चेहरे के पास बैठो,
किसी का हाथ पकड़ो,
किसी अनजान के लिए
थोड़ा-सा मनुष्य बनो।
क्योंकि
तबाही सब कुछ छीन सकती है,
पर यदि संवेदना बची रहे—
तो मलबे के बीच से भी
ज़िंदगी फिर उग आती है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X