शीर्षक: स्वप्न और सत्य
स्वप्निल था मैं तो निद्रा में मग्न,
सत्य से था पूर्णतः बेखबर।
जाने कब का हो गया सवेरा,
मैं अब भी सोया था जानकर अंधेरा।
निद्रा ने मधुर स्वप्न का जाल बिछाया,
लक्ष्य को मीलों दूर पहुँचाया।
स्वप्न में खोया पड़ा,लक्ष्य को मैं भूल गया,
किया परिश्रम अब तक जो फ़िज़ूल गया।
आँख खुली जब ,वह स्वप्न टूट गया,
दुनिया की भीड़ में ,मैं तो पीछे छूट गया।
होश संभाला मुश्किल से, देर से था जागा,
भीड़ को पकड़ने फिर हड़बड़ी में भागा।
दौड़ते-भागते गिरा जब, थककर चूर,
चौराहे पर बैठ गया।
लाचार दृष्टि डालता हुआ मुझ पर,
कभी भिखारी कोई, कभी धनी सेठ गया।
स्वप्न में तो, जीत लिया जग सारा,
मगर हकीकत के आईने में, मैं खड़ा बेबस बेचारा।
राग-रंग मन ही नहीं भाता,
जिस स्वप्न के लिए सोया देर तक,
अब तो वह स्वप्न भी नहीं आता।
जैसा मैं खोया स्वप्नों में, तुम कभी मत खोना,
स्वप्नों में रहना मगर ,सत्य से अनभिज्ञ कभी मत होना।
नाम : राधा चौहान
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