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बेटी क्यों बोझ है

                
                                                         
                            जिस घर में खेली कूदी
                                                                 
                            
उस घर ने ही ठुकराया है
बेटी हूं मैं कोई बोझ नहीं
जो समाज ने भी ठुकराया है

बिन बेटी के दुनिया में
कुछ भी नहीं पाओगे
अंधकार ही अंधकार होगा
फिर बहुत पछताओगे

समाज में बेटी को
कमजोर समझने वाले
क्या बेटी को ऐसी दफनाओगे
तो अपना वंश कैसे आगे चलाओगे

एक दिन जब बेटी ही नहीं होगी दुनिया में
तो क्या बेटे की शादी बेटे ही करवाओगे
बेटे की तरह बेटी भी नाम रोशन कर सकती हैं
एक मौका तो देके देखो
बेटे से आगे निकल सकती हैं

- शिवानी बजाज
 
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4 वर्ष पहले

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