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मेरी बात भी थी।।

                
                                                         
                            सबकी अपनी परेशानियाँ थीं,
                                                                 
                            
सबके अपने दुख थे,
मैंने सबको समझने की कोशिश की।

किसी की बात नहीं काटी,
किसी की भावनाओं को गलत नहीं कहा,
बस चाहती थी
कि कोई मेरी बात भी सुन ले।

पर जब मैंने अपना दर्द बताया,
तो मुझे ही समझाया गया—
“बड़े हैं, उनकी बात मानो।”
“घर की बात है, छोड़ दो।”
“तुम ही थोड़ा पीछे हट जाओ।”

मैं हर बार पीछे हटती गई,
और सब आगे बढ़ते गए।

किसी ने ध्यान ही नहीं दिया
कि मुझे पीछे हटते-हटते
कितना अकेलापन मिल गया।

मैंने रिश्ते बचा लिए शायद,
पर खुद को खोती चली गई।

काश, कभी किसी ने
रिश्ता बचाने से पहले
मेरा मन बचाने की कोशिश की होती।
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1 hour ago

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