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तुम भी होती

                
                                                         
                            सोचता हूँ
                                                                 
                            
कितना हसीन लम्हा बन जाता ये जो तुम भी होती,
कभी बांट लेता मायूसी अपनी,
कर गुफ्तगु सुनहरे पलों की।
कभी जब भर जाती पलकें मेरी,
तो गिरा लेता चार आंसू कांधे पे तेरे.
कभी हो जाता मायूस ये दिल,
तो ढूँढ लेता वजह हँसने की,
कभी बेवजह ही सता के तुझको।
जब हो जाती बेचैन ये जिंदगी,
तो ढूँढ लेते एक-दूजे मे सुकूँ अपना।
कभी जब खिलाफ हो जाती ये पुरी दुनिया,
चट्टान बन लड़ जाता तुम्हारे सहारे से मै.
तुम होती तो ये पल भी मुलायम होते,
ये वक्त का रूखापन अब बर्दाशत नही होता.
अकेला लड़कर थकने लगा है ये बदन,
तेरे यादों का मरहम भी अब बेअसर हो रहा है।
अब दुनिया के बकवास लतिफों पर कैकई लगाता हूँ मै,
मेरी मुस्कान जब से हर ले गई हो तुम.
तुम्हे पता नही शायद,
आजकल मेरे अधरों की मुस्कान देख,
मुझे उपाधियां मिलने लगी है खास जगहों पर,
वो बात और है,
कभी नही देखा किसी ने उस दर्द और मायूसी को,
जिनका आवरण बन ढक रहे हैं मुस्कान मेरे।
तुम होती तो ढूँढती वो वजहें जरूर शायद.
कितनी अलग होती ये जिंदगी मेरी,
जो तुम भी होती।
– दूबे शिवम्
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एक वर्ष पहले

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