जिंदगी तो तब भी मेरी खिली थी ,
जब मैं तुमसे नहीं मिली थी ,
फिर ना जाने ,तुम छांव बन कर आये ,
या फिर घाव बन कर आये ,
या फिर शाम को मिटा देने वाली रात बन कर ,
या अंधेरी रातों में तारों की बारात बन कर ,
पर अब कोई बात नहीं ,
ये ज़िंदगी है मेरी कोई रात नहीं ।
नहीं ढ़ूँढ़ती अब मैं रातों में भी सूरज को ,
नहीं ढ़ूँढ़ती ये नज़रे भी अब किसी चराग़ों को ।
जीवन ज्योति बन जाती हूँ ,
ख़ुद राहें रौशन कर जाती हूँ ।
प्रकाशित कर हर तम को ,
भर लेती हूँ दिव्य जागृति से उर को ।
तूफ़ानों से लड़ना हो ,
या फिर दुनिया से आगे बढ़ना हो ,
उस वक्त अभय बन जाती हूँ ,
शिव की शक्ति हो जाती हूँ ।
नहीं रोक सकता ये जग सारा ,
हूँ मैं गंगा की अविरल धारा ,
बस यही संकल्प है शिव को पाने को ,
बाँहों में आसमान भर लाने को ।
जल से भी शीतल हूँ मैं ,पवन से भी चंचल ,
कोटि चंद्र-स्वरुपा हूँ मैं ,
अगणित दिशाओं की मैं अंचल ।
दिव्य स्रोत हूँ मैं प्रसन्नता की,
अविस्मरणीय है रहती सदा
आभा मेरी नवीनता की ,
पुकार जब अंतर्मन की सुनती हूँ ,
अभय-शिव-शक्ति हो जाती हूँ ।।
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