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“जो भीतर रह गया” — रिश्तों, प्रेम और वियोग के मुक्तक

                
                                                         
                            डूबती नाव को साहिल का किनारा मिला है,
                                                                 
                            
रेत को जैसे कोई चाँद सितारा मिला है।
मैं चुकाऊँ भी तो कैसे तेरे एहसानों का ऋण—
मेरी हर साँस को जीने का सहारा मिला है।

अँधेरी रात में जैसे कोई तारा मिला है,
सूखे होंठों को जैसे कोई धारा मिला है।
लौटाऊँ किस तरह मैं ये करम उम्र भर के—
मुझे हर जन्म में तुम-सा सहारा मिला है।

धूप में जलती रही, मेरे लिए छाँव बनकर,
रात भर जागी मेरे सपनों की निगहबाँ बनकर।
मैं तो मिट्टी था, मुझे आसमाँ तक ले आई—
माँ मिली तो मिली ज़िंदगी, भगवान बनकर।

मेरे सपनों की खातिर जो स्वयं ढलता रहा,
धूप कितनी भी मिली, चुपचाप चलता रहा।
मैंने पूछा ही नहीं, दर्द कितना था उन्हें—
मेरी ख़ातिर एक पिता उम्र भर जलता रहा।

तेरी यादों की हवा आज भी महकती है,
तेरे होने से मेरी रात भी चहकती है।
तू मिली तो लगा, पूरी हुई कोई दुआ—
वरना ये ज़िंदगी बस साँस लेकर बहकती है।

समंदर की तरह चुप है, मगर गहरा बहुत है,
तेरा मेरा ये रिश्ता सबसे सुनहरा बहुत है।
किनारे ढूँढ़ते रहना है तो दुनिया के लिए—
मेरे हिस्से का ये सागर तो ठहरा बहुत है।

तेरी आँखों में उतरकर जो समंदर देखा,
फिर किसी और किनारे का न मंजर देखा।
इश्क़ की गहराई को नाप सके कौन भला—
मैंने डूबकर ही जाना, तुझे बेहतर देखा।

तेरे जाने से घर का हर कोना रोता रहा,
चाँद खिड़की पर मगर सारी रात सोता रहा।
लोग कहते हैं कि वक़्त हर दर्द मिटा देता है—
वक़्त गुज़रता रहा, दर्द मगर होता रहा।

तेरी यादों का धुआँ आँख में भरता रहा,
एक सूना-सा शहर दिल में उतरता रहा।
तू नहीं था तो समझ आया मोहब्बत क्या है—
मैं किनारा था, मगर रोज़ समंदर मरता रहा।

मिलन भी एक पड़ाव है, बिछड़ना भी सफ़र है,
जिसे हम खो चुके हैं, वो हमारे अंदर है।
उसे पाने की तमन्ना में भटकते हैं सभी—
प्रेम शायद नाम ही है, जो नहीं है फिर भी है।

समंदर पूछता रहा, किसलिए साहिल की चाहत है,
सफ़र पूछता रहा, किसलिए मंज़िल की चाहत है।
वो मिला तो प्रेम था, वो गया तो प्रेम ही निकला—
अजीब रिश्ता है दिल का—वियोग भी मोहब्बत है।

समंदर था मेरे भीतर, मगर प्यासा रहा,
तू गया तो भी तेरा अक्स किनारा रहा।
मैंने जाना कि मिलन अंत नहीं होता कभी—
जिसे खोना पड़ा, वही उम्र भर हमारा रहा।
-शीतल राज 'किशोर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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