शर्म बेचकर अब बाजार सजे हैं
झूठ के आगे सच बेबस पड़े हैं
बात सिर्फ होती यहां पैसों की
नेक नियत को अब कौन सुने हैं
घरों के भीतर अब झूठ है काबिज
सच दहलीज पर हाथ बांधे खड़े हैं
फिक्र सबको है झूठ से बचाने की
लेकिन सच का साथ स्वीकार नहीं है
-शैलेंद्र शुक्ला "हलदौना "
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