अपनी ही गिरफ्त में हैं हम,
दिखते भरें पर रिक्त हैं हम।
कहने को तो एक ही हैं हम,
पर खुदगर्जी में व्यस्त हैं हम।
बात तो करते फिरते सच की,
पर झूठ से भरे खेत हैं हम।
सच का मुखौटा झूठ पर सजाकर ,
शहर में महफिले शिरकत हैं हम।
दावा बेशक हमारा जागने का,
अंधेरों की गोद में सुप्त हैं हम।
अपनी ही गिरफ्त में हैं हम,
दिखते भरें पर रिक्त हैं हम।
-शैलेंद्र शुक्ला"हलदौना"
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